Thursday, 11 August 2011

अब भी मुन्नाभाई मैं ही हूं- संजय दत्त

संजय दत्त ने इन ख़बरों का खंडन किया है कि आमिर ख़ान अगले मुन्नाभाई बनने जा रहे हैं. संजय दत्त ने ज़ोर देकर कहा कि वो ही हैं असल मुन्नाभाई.
मुंबई में अपनी आने वाली फ़िल्म चतुर सिंह टू स्टार के प्रमोशन के मौक़े पर संजय दत्त ने कहा, "मैंने तो नहीं सुना है कि आमिर मुन्नाभाई बनने जा रहे हैं. अभी तक के हिसाब से तो इस सीरीज़ की अगली फ़िल्म भी मैं ही कर रहा हूं. अब भी मैं ही मुन्नाभाई हूं और अरशद वारसी ही सर्किट हैं."
दरअसल मीडिया में पिछले दिनों ख़बरें आ रही थीं कि निर्माता विधु विनोद चोपड़ा मुन्नाभाई सीरीज़ की तीसरी फ़िल्म में आमिर ख़ान को मुख्य किरदार मुन्नाभाई के लिए और शरमन जोशी को सर्किट के रोल के लिए लेना चाहते हैं.
इस सीरीज़ की पहली दो फ़िल्मों, मुन्नाभाई एमबीबीएस और लगे रहो मुन्नाभाई में संजय दत्त मुन्नाभाई बने थे और अरशद वारसी ने उनके दोस्त सर्किट का किरदार निभाया था.
मैंने तो नहीं सुना है कि आमिर मुन्नाभाई बनने जा रहे हैं. अभी तक के हिसाब से तो इस सीरीज़ की अगली फ़िल्म भी मैं ही कर रहा हूं. अब भी मैं ही मुन्नाभाई हूं और अरशद वारसी ही सर्किट हैं.
संजय दत्त, अभिनेता
दोनों ही फ़िल्में ज़बरदस्त कामयाब रहीं और मुन्नाभाई का किरदार लोगों के बीच ख़ासा मशहूर हो गया. यहां तक कि संजय दत्त को उनके प्रशंसक मुन्नाभाई के नाम से ही बुलाने लगे.
संजय दत्त कहते हैं, "मुन्नाभाई को लोगों का भरपूर प्यार मिला. मैं भाग्यशाली हूं कि मुझे इस किरदार को निभाने का मौक़ा मिला."
बीते दिनों संजय दत्त और सलमान ख़ान के झगड़े की ख़बरों ने भी ख़ूब सुर्खियां बटोरीं. लेकिन संजय ने इन ख़बरों का भी ज़ोरदार खंडन किया.
उन्होंने कहा, "सलमान मेरा छोटा भाई है. मैं उससे कभी झगड़ा नहीं कर सकता. वो मेरे घर पार्टी में आया. हम दोनों दोस्त कुछ बात करने मेरे गैराज में गए. तो मीडिया ने बेकार में हमारे झगड़े की बातें उछाल दीं."
संजय दत्त ने ये भी बताया कि उनकी बहनों के साथ उनके अब भी बहुत बेहतर संबंध हैं और वो रक्षाबंधन का त्यौहार साथ मनाने वाले हैं.

सिगरेट औरतों के लिए ज़्यादा घातक

एक शोध से पता चला है कि धूम्रपान से महिलाओं में पुरुषों की तुलना में दिल का दौरा पड़ने की संभावना काफ़ी बढ़ जाती है.यह शोध अमरीका स्थित वैज्ञानिकों ने सिंगापुर, नॉर्वे और तुर्की जैसे कई देशों में किया है.
लॉन्सेट पत्रिका में प्रकाशित लेख में इसका कोई कारण नहीं बताया गया है लेकिन ये संकेत दिए गए हैं कि महिलाएं सिगरेट से निकलने वाले विषाक्त रसायनों को पुरुषों की तुलना में ज़्यादा आत्मसात करती हैं.
यही कारण है कि सिगरेट पीने वाली महिलाओं में पुरुषों का तुलना में फेफड़े का कैंसर होने की संभावना भी अधिक होती है.
बहुत पहले से ही यह स्पष्ट हो चुका है कि धूम्रपान से दिल का दौरा पड़ने का ख़तरा बढ़ जाता है. लोकिन करीब पच्चीस लाख लोगों पर शोध करने के बाद ये बात पहली बार सामने आई है कि महिलाओं पर इसका असर पुरुषों की तुलना में ज़्यादा पड़ता है.
शोध के अनुसार धूम्रपान से महिलाओं को पुरुषों की तुलना में दिल की बीमारी होने की संभावना पच्चीस फ़ीसदी ज़्यादा होती है.
अब शायद तंबाकू नियंत्रण कार्यक्रमों को महिलाओं पर विशेष ध्यान देना चाहिए ख़ासकर उन देशों में जहाँ युवा महिलाओं में धूम्रपान करने का चलन बढ़ रहा है.

स्वतंत्रता दिवस

आजादी के बाद से हमारे देश में राजनीतिक पार्टियों, राजनेताओं व नौकरशाहों के चरित्र और नैतिक मूल्यों में लगातार गिरावट ने दर्शाया है कि धृतराष्ट्र का कुर्सी प्रेम किन-किन विचित्र खेलों को जन्म देता है। चुनाव लड़ना अब हिंसा, धन और बाहुबल का खेल होकर रह गया है।


हमारी लोकतांत्रिक संस्थाओं में अपराधियों की भरमार होती जा रही है। क्या यही बापू के सपनों का भारत है? मंत्री, अफसर, धन्नासेठ सभी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हाथों की कठपुतली बने हुए हैं। कुल मिलाकर देश का भविष्य इन्हीं के हाथों में कैद होता जा रहा है।

'तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा', के नारे, और संकल्प को साकार करने वाले नेताजी सुभाषचंद्र बोस जैसा दूसरा नेता आजादी के बाद देश में न होना दुर्भाग्य की बात है। अपने अतीत से सबक नहीं लेने वाले देशों का इतिहास ही नहीं, भूगोल भी बदल जाता है। आज देश में धीरे-धीरे ही सही आजादी के पहले की स्थिति येन-केन-प्रकारेण निर्मित होती दिख रही है।

लेकिन, सत्ता में काबिज राजनेताओं की आंखों पर राजनीतिक स्वार्थ की पट्टी बंधी हुई है। वे तो बस अपना घर भरने और कुर्सी बचाने में ही अपनी शक्ति लगा रहे हैं। वहीं, विपक्षी राजनेताओं का एक सूत्री कार्यक्रम है कि उन्हें सत्ता कैसे हासिल हो?

इन दो पाटों के बीच में आम जनता पिस रही है और मां भारती खून के आंसू बहा रही है। वो बिलख-बिलख कर कह रही हैं कि कहां हैं मेरे प्यारे महात्मा गांधी, बच्चों के चाचा जवाहरलाल नेहरू, आजादी के दीवाने सुभाषचंद्र बोस, चंद्रशेखर आजाद, भगतसिंह ....? जिन्होंने मुझे अंग्रेजों की कैद से तो आजादी दिला दी, लेकिन अपनों के हाथों घुट-घुटकर जीने को छोड़ दिया।

अरे, मेरे बच्चों कोई तो मेरे इन लालों के आदर्शों पर चलो, उनके स्वप्नों को साकार करो। जीवनभर उनके बताए मार्गों पर नहीं चल सकते तो दो-चार कदम ही बढ़ो। इतने में ही मेरा मान-सम्मान बढ़ सकेगा और मेरे ऊपर आए नक्सलवाद, आतंकवाद, दंगा, महंगाई, बेरोजगारी, गरीबी, अशिक्षा, धर्म, भाषा व क्षेत्रवाद की मुसीबतें टल जाएंगी।

देशवासियों के सामने एक प्रश्न यह भी है कि आखिर हम क्यों पी रहे हैं, पानी खरीदकर? प्रकृति प्रदत्त हवा, पानी पर तो सभी का समान अधिकार है। फिर कौन लोग हैं जो पानी बेच रहे हैं? लोग आखिर क्यों खरीद रहे हैं,पानी ? सरकार क्या कर रही हैं। जीने के लिए दो जून की रोटी की जरूरत तो सभी को है, लिहाजा कुछ लोग गरीबी, भुखमरी, तंगहाली के चलते तो कुछ पैसे कमाने की खातिर खून बेचने, खरीदने का धंधा कर रहे हैं।

अब पानी का व्यवसाय फल-फूल रहा है। ऐसी स्थिति में वह दिन दूर नहीं जब सांस लेने के लिए हवा खरीदनी पड़ेगी? आखिर लोग विरोध क्यों नहीं करते?

देश में प्रजातंत्र है। सरकार जनता की है। जनता के लिए है, और जनता ने ही चुनी है। तो फिर ऐसी सरकार की जरूरत क्यों है, जिनके राज में पानी खरीद कर पीना पड़े, शुद्ध हवा भी न मिले, दो जून की रोटी के लिए खून बेचना पड़े? अगर समय रहते केंद्र और राज्य सरकारों की आंखें नहीं खोली गईं तो वह दिन दूर नहीं जब सांस लेने के लिए भी अनुमति लेनी पड़ेगी?

अब देश में ऐसी कौन सी चीज बची है जो नहीं बिकतीं? स्वयंभू धर्माचारी, राजनेता, अधिकारी, कर्मचारी, व्यापारी, उद्योगपति बिके हुए हैं, पुलिस व कथित तौर पर न्यायाधीश पर भी बिकने का आरोप है।

ऐसे हालात में क्या देश का कोई नागरिक गर्व से यह कह सकता है कि वह देवताओं की भूमि भारतवर्ष में रहता है, जहां धर्म, कर्म, नैतिकता ही प्रधान रही क्या यह बलिदानी भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद, सुभाषचंद्र बोस जैसे शूरवीर की भूमि है, महात्मा गांधी, महावीर, नानक, गौतम बुद्ध, कबीर जैसे संत-महात्माओं की कर्मभूमि है?

जरा सोचिए! कहते हैं एक व्यक्ति से बड़ा परिवार, परिवार से ब़ड़ा समाज और समाज से बड़ा देश होता है। विपत्ति के समय परिवार के लिए खुद को, समाज के लिए परिवार को और देश के लिए समाज को कुर्बान कर देना चाहिए। लेकिन, आज देश में ऐसा होते कहीं दिखाई नहीं देता? उल्टे ऐसे लोग हैं जो स्वयं को परिवार, समाज और देश से बड़ा समझने लगे हैं।

यदि ऐसा नहीं होता तो कोई राजनेता भ्रष्ट न होता, अधिकारी-कर्मचारी ईमानदार व कर्तव्यपरायण होते, व्यापारी, उद्योगपति देश की संपत्ति नहीं लूटते और जनता सरकारी संपत्ति की समुचित सुरक्षा करते, बात-बेबात पर आगजनी, तोड़फोड़ कभी न करते।

विकास के नारे लगाने वाले लोग क्या पैसे की चकाचौंध में अंधे हो गए हैं? जिन्हें लाखों भूखे, नंगे, अशिक्षित, भिखारी, गंदी बस्तियों व झोपड़पट्टियों में रहने वाले लोग, जंगलों में निवासरत आदिवासियों की दशा दिखाई नहीं देती। क्या ये भारत के वासी नहीं है?

समाज सेवा का क्षेत्र हो या धर्म-अध्यात्म अथवा राजनीति का, चारों ओर अवसरवादी, सत्तालोलुप, आसुरी वृत्ति के लोग ही दिखाई देते हैं। शिक्षा और चिकित्सा के क्षेत्र, जहां कभी सेवा के उच्चतम आदर्शों का पालन होता था, आज व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा के केंद्र बन गए हैं। व्यापार में तो सर्वत्र कालाबाजारी, चोर बाजारी, बेईमानी, मिलावट, टैक्सचोरी आदि ही सफलता के मूलमंत्र समझे जाते हैं। त्याग, बलिदान, शिष्टता, शालीनता, उदारता, ईमानदारी, श्रमशक्ति का सर्वत्र उपहास उड़ाया जाता है। गरीबी और महंगाई आज देश की विकट समस्या है।

गरीबी का अर्थ समाज की क्षमताओं और विचारों के अनुरूप जीवनस्तर और जीवन-प्रणाली से वंचित होना है। गरीबी निवारण का अर्थ है लोगों को ऐसा जीवनस्तर और जीवन-प्रणाली प्रदान करना जिससे वे सामाजिक, राजनीतिक व सांस्कृतिक जीवन में संयुक्त रूप से सहभागिता प्राप्त कर सकें।

क्या यह सही नहीं है कि आज देश में आजादी की क्रांति की भांति ही एक और बगावत की सख्त जरूरत है। ताकि, भ्रष्टाचार, बेईमानी, बेरोजगारी, हिंसा, अशिक्षा, असमानता, गरीबी, महंगाई, आतंकवाद, नक्सलवाद का अंत हो सके। भारत माता की इस पीड़ा को कौन समझेगा?

Wednesday, 10 August 2011

सेट के चारों ओर पानी

मुंबई में इतनी बारिश हुई कि जी टीवी पर प्रसारित होने वाले धारावाहिक ‘संस्कार लक्ष्मी’ के सेट के चारों ओर पानी भर गया। इस शो में लक्ष्मी की भूमिका निभाने वाली विभा आनंद जब सेट पर पहुंची तो पानी को हटाया जा रहा था।

विभा के पास खाली समय था और इसी दौरान उन्हें घूमने की इच्छा हुई। अपने मेकअप मैन मनोज को उन्होंने बुलाया और कहा ‘मैं बाइक पर तुम्हारे पीछे बैठूंगी। यदि जमीन पर पैर टिकाए बिना डूबे सेट का तुम पूरा चक्कर लगाओगे तो सेट पर मौजूद सभी लोगों को गरमागरम भजिए और वड़ा पाव खिलाऊंगी।‘

हाथ मिलाए गए और शर्त पक्की हो गई। मनोज ने विभा को बैठाया और सेट का चक्कर लगाने लगा। घुटने-घुटने पानी था, लेकिन मुश्किलों से जूझते हुए मनोज ने बिना पैर जमीन पर टिकाए सेट का पूरा चक्कर लगा दिया।

विभा शर्त हार गई, लेकिन इस सवारी से वे इतनी रोमांचित हुई कि उन्होंने खुशी-खुशी पकौड़े और वड़े पाव का आर्डर दे डाला।

रक्षाबंधन का पर्व

सावन के रिमझिम मौसम के साथ ही भारत में त्योहारों की रंग-बिरंगी श्रृंखला आरंभ हो जाती है। यह त्योहार रिश्तों की खूबसूरती को बनाए रखने का बहाना होते हैं। यूं तो हर रिश्ते की अपनी एक महकती पहचान होती है। भाई-बहन का रिश्ता एक भावभीना अहसास जगाता है। रक्षाबंधन का पर्व इसी रेशमी रिश्ते की पवित्रता का प्रतीक है।
यह रिश्ता जीवन के विविध उतार-चढ़ाव से गुजरते हुए भी एक गहरे, बहुत गहरे अहसास के साथ हमेशा ताजातरीन और जीवंत बना रहता है। मन के किसी कच्चे कोने में बचपन से लेकर युवा होने तक की, स्कूल से लेकर बहन के बिदा होने तक की और एक-दूजे से लड़ने से लेकर एक-दूजे के लिए लड़ने तक की असंख्य स्मृतियाँ परत-दर-परत रखी होती है। बस, भाई-बहन के फुरसत में मिलने भर की देर है, यादों के शीतल छींटे पड़ते ही अतीत के केसरिया पन्नों से चंदन-बयार उठने लगती है। एक ऐसी सौंधी-सुगंधित सुवास जो मन के साथ-साथ पोर-पोर महका देती है।

सुहाना बचपन : सहज मनोविज्ञान
भाई का नन्हा-सा दिल पहली बार जब छोटी-सी गुलाबी-गुलाबी बहन को देखता है तब अनजानी, अजीब-सी अनुभूतियों से भर उठता है। थोड़ी-सी जिम्मेदारी, थोड़ी-सी चिंता, थोड़ा-सा प्यार, थोड़ी-सी खुशी, थोड़ी-सी जलन, थोड़ा-सा अधिकार ऐसी ही मिलीजुली भावनाओं के साथ भाई-बहन का बचपन गुलजार होता है।

मनोविज्ञान कहता है, अक्सर बड़े भाई-बहन अपने नवागत भाई या बहन को लेकर असुरक्षित महसूस करते हैं। वह मन ही मन खुद को उपेक्षित और अवांछित भी समझ सकते हैं। यहां परिवार और परवरिश दोनों की अहम भूमिका होती है। घर के बड़े हंसी-मजाक में भी कभी बच्चे को यह अहसास ना कराएं कि नए बच्चे के आगमन से उसकी अहमियत कम हो जाएगी। इस उम्र में बैठा उनका यह डर ग्रंथि बनकर रिश्तों की डोर कमजोर कर सकता है। भाई और बहन के बीच स्वस्थ रिश्ते की बुनियाद रखने की जिम्मेदारी माता-पिता की होती है।

खासकर भाई अगर बड़ा है तो उसे नई बहन के प्रति संवेदनशील बनाने के लिए शिक्षा दें कि यह नन्ही जान उसके साथ खेलने और पढ़ने के लिए लाई गई है। उसके अकेलेपन को दूर करने के लिए उसे भेजा गया है। जैसे-जैसे वह बड़ी होगी उसकी खुशियों का सबब बनेगी।

अगर बहन बड़ी है तो उसे यह अहसास दिलाएं कि छोटा भाई आने से उसको मिलने वाले प्यार में कमी नहीं होगी ना व्यवहार में बदलाव आएगा। लड़कियां यूं भी मानसिक रूप से इस मामले में मजबूत होती है उन्हें बस इतना भर बताया जाना चाहिए कि इस छोटे प्राणी को अभी ज्यादा देखभाल की जरूरत है।

भाई-बहन के रिश्ते के मनोविज्ञान का बस इतना ही सच है कि उन्हें स्वस्थ वातावरण में बिना किसी भेदभाव के खिलने-खेलने-पनपने का अवसर दीजिए। प्यार की सौगात से तो ईश्वर ने स्वयं उन्हें नवाजा है आप उन्हें उस प्यार को महकाने की खुशनुमा भावनात्मक बगिया दीजिए।

नटखट बचपन : नन्ही शैतानियां
याद कीजिए अपने बचपन की शरारतें। क्या भाई-बहन के बिना वे इतनी मोहक और मासूम हो सकती थी? नहीं ना? ठीक इसी तरह आज के बचपन को भी खुलकर जीने दीजिए। बचपन की मयूरपंखी स्मृतियां उनके भविष्य की भी मुस्कान बने इसलिए बहुत जरूरी है कि बड़ा भाई अपनी छुटकी बहन के उल्टे-सीधे नाम रखें, बहुत जरूरी है कि दोनों साथ-साथ उछले-कूदे, गिरे-पड़े, धमाधम धिंगामुश्ती करें। जरूरी है कि पेड़ पर चढ़े और मिट्टी में सने, जरूरी है कि एक दूसरे के खिलौनों को तोड़े-छुपाए।

सोचिए अगर आपने यह सब उन्हें नहीं करने दिया तो कल बड़े होकर वे क्या याद करेंगे? यह कि मेरा बस्ता तुम्हारे बस्ते से ज्यादा भारी था, या यह कि मैंने तुमसे ज्यादा कोचिंग ली, या यह कि कंप्यूटर का माउस तुमने तोड़ा था और मार मुझे पड़ी थ‍ी। इन यादों में बचपन तो होगा लेकिन टूटते-बिखरते अनारों से ठहाके नहीं होंगे, बेसाख्ता फूट पड़ती हंसी के फव्वारे नहीं होंगे, मीठी चुटकियां नहीं होगी, चटपटी सुर्खियां नहीं होंगी।

इन बातों में वह बचपन होगा जो नटखट लम्हों और भोली नादानियों से जुदा होगा। इसलिए सभी नन्हे भाई-बहन को हर पल साथ में ही तीखी-मीठी नोकझोंक के साथ गुजारने दीजिए। उनके रिश्तों के अमलतास हमेशा खिले रहेंगे।

त्योहार के बहाने : रिश्ते नए-पुराने
आज सारे त्योहार तकनीक और आधुनिकता की भेंट चढ़ गए हैं। रक्षाबंधन का त्योहार भी अछूता नहीं रहा। लेकिन इसके बावजूद सबसे बड़ी बात यह है कि रिश्तों की गर्माहट, आंच, तपन या उष्मा कुछ भी कह लीजिए, वह बरकरार है। आज भी भाई का मन अपनी बहन के लिए उतना ही पिघलता है, आज भी बहन का प्यार भाई के लिए उतना ही मचलता है। यह बात और है कि तरीके बदल गए हैं, भावाभिव्यक्तियां बदल गई हैं, अंदाज बदल गए हैं मगर अहसास वही है।

चाहे इंटरनेट पर अदृश्य राखी पहुंचे या मोबाइल पर कोई भावुक-सा मैसेज चमके, चाहे हाथों में 'प्यारे भैया' का टैग लगी राखी हो या लिफाफे में पसीने की कमाई से भीगा शगुन हो। यह प्यारा रिश्ता अपनी गहराई और गंभीरता नहीं भूल सकता।

भावुकता की लहर में यही पंक्तियां उभरती है :

बहनें चिड़‍िया धूप की, दूर गगन से आए
हर आंगन मेहमान-सी, पकड़ो तो उड़ जाए।
 
 

Tuesday, 9 August 2011

जॉन अब्राहम को टैटू से नफरत है

जॉन अब्राहम को टैटू से नफरत है क्योंकि उनका मानना है कि इससे न केवल शरीर को दर्द से गुजरना पड़ता है बल्कि यह शरीर को नुकसान भी पहुंचाता है। भले ही उनकी शानदार बॉडी हो, लेकिन उस पर टैटू बनवाने के वे सख्त खिलाफ हैं।

जॉन का कहना है कि वे अपने शरीर से खिलवाड़ करना पसंद नहीं करते हैं। वे शरीर को एक मंदिर की तरह मानते हैं और उसी की तरह उसकी देखभाल करते हैं। उनकी नजर में स्वास्थ्य से बढ़कर कुछ नहीं है।

जॉन के अनुसार सही मात्रा में खाना चाहिए और उन्हीं चीजों को खाने में महत्व देना चाहिए जिससे शरीर को नुकसान ना पहुंचे। साथ ही रोजाना वर्कआउट या योगा करना चाहिए।

जॉन कभी भी वर्कआउट मिस नहीं करते हैं भले ही रात में सोने में उन्हें कितनी ही देर क्यों ना हो जाए। वे पार्टी पर्सन लगते हैं, लेकिन पार्टियों में जाना उन्हें पसंद नहीं है। कभी-कभी खास दोस्तों के साथ ही उन्हें पार्टी करना पसंद है।