Sunday, 29 July 2012

पूज्यपाद दंडी स्वामी डा. केशवानंद सरस्वती ने किया श्रावण शुक्ल पक्ष की एकादशी के उपलक्ष्य में पौधारोपण


पूज्यपाद दंडी स्वामी डा. केशवानंद सरस्वती ने सनातन धर्म सभा में श्रावण शुक्ल पक्ष की एकादशी के उपलक्ष्य में पौधारोपण किया। इस मौके पर डा. सरस्वती ने कहा कि अपने जीवन को सार्थक बनाने के लिए मनुष्य को दिन में एक मिनट भी आत्मीयता से सिमरन करे तो चौबीस घंटे के बाकी समय के अनजाने में हुई गलती माफ हो सकती है। उन्होंने कहा कि मानव जीवन के कल्याण के लिए सामाजिक और धाॢमक अनुष्ठान जरूरी है। पर्यावरण की स्वच्छता के लिए श्रावण माह में पौधारोपण अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस अवसर पर सनातन धर्मसभा के सदस्यों ने स्वामी जी को पौधारोपण कार्यक्रम में विशेष रूप से आमंत्रित किया। स्वामी जी के सभा प्रांगण में पहुंचने पर सभा के कार्यकारी प्रधान नवीन केडिया सहित सभी सदस्यों ने स्वामी जी का माल्यार्पण व मंत्रोच्चारण के साथ स्वागत किया। इस कार्यक्रम में स्वामी जी द्वारा पौधारोपण किया गया। इस अवसर पर जयगोबिंद गर्ग, अशोक बांसल, केके शर्मा, प्रमोन मोहन गौतम, राम अवतार हिसारिया, महेश बांसल, बजरंग पारीक, वैद्य महावीर प्रसाद आदि ने भी पौधारोपण किया। इस मौके पर मुख्य पुजारी हंसराज, सुरेंद्र, दिनेश कुमार, पवन शर्मा, शिव कुमार, प्रवीण सर्राफ केके कटारिया आदि उपस्थित थे। 

Sunday, 8 April 2012

उच्च न्यायालय में जाएंगे सेक्टर-19 के प्लाट धारक

सिरसा। हुडा द्वारा विकसित किए जा रहे सेक्टर-19 के प्लाट धारकों ने इस बात को लेकर भारी रोष है कि हुडा के अधिकारियों द्वारा अद्र्धविकसित सेक्टर-19 के प्लाट धारकों पर पिछले दो वर्षों से जबरन ब्याज थोप दिया है। हुडा के अधिकारियों के इस कुकृत्य के विरुद्ध हुडा वेल्फेयर एसोसिएशन सेक्टर-19 ने पंजाब-हरियाणा उच्च न्यायालय में जाने का निर्णय लिया है। आज सेक्टर-20 में स्थित डे-केयर सेंटर में एसोसिएशन की एक बैठक में यह निर्णय लिया गया। यह बैठक एसोसिएशन के प्रधान वी.के. गर्ग की अध्यक्षता में हुई। बैठक के बाद जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में एसोसिएशन के सचिव अशोक बंसल ने बताया कि हुडा ने लगभग दो वर्ष पूर्व प्लाट धारकों को पत्र भेजकर प्लाटों का कब्जा अपने आप देने का निर्णय लिया जबकि उस समय सेक्टर - 19 में बुनियादी सुविधाओं के नाम पर एक भी सुविधा नहीं थी। उन्होंने बताया कि हुडा के नियमों के अनुसार प्लाट धारकों को कब्जा देने के बाद बकाया राशि पर ब्याज लगना आरंभ हो जाता है। उन्होंने बताया कि नियमों के अनुसार जब तक सेक्टर में सड़कें, बिजली, स्ट्रीट लाइट, शिविर, पेयजल सप्लाई व अन्य बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध नहीं करवाई जाती तब तक प्लाट धारकों को कब्जा नहीं दिया जाता। उन्होंने बताया कि सूचना के अधिकार के अतंर्गत अनेक प्लाट धारकों व एसोसिएशन द्वारा मांगी गई जानकारी में हुडा ने यह माना है कि आज तक सेक्टर-20 व सेक्टर-19 के लिए डिस्पोजल व नहरी पेयजल का प्रबंध नहीं किया गया। यही नहीं अनेक सड़कों को जोडऩे का काम आज भी चल रहा है। पूरे सेक्टर में स्ट्रीट लाईट नहीं है। उन्होंने बताया कि इन सभी मुद्दों को लेकर पंजाब-हरियाणा उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की जाएगी ताकि प्लाट धारकों को राहत मिल सके।

Wednesday, 4 April 2012

भव्य शोभा यात्रा

 श्री हनुमान जयन्ती समारोह के उपलक्ष्य में  4 अप्रैल को 351 धर्म ध्वजा एवं भव्य शोभा यात्रा स्थान चिडावा वाली धर्मशाला काठ मण्डी से प्रारम्भ होकर श्री सालासर धाम मन्दिर पहुंची । इस अवसर पर मुख्य अतिथि के तोर पर श्री तारा बाबा कुटिया के मुुख्य सेवक गोबिन्द काण्डा मोजूद होंगे।  

Thursday, 29 March 2012

विचार योग' से पाएं सेहत, खुशी और सफलता


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अजीब है कि कोई दवा नहीं, एक्सरसाइज नहीं और कोई भी इलाज नहीं फिर भी लोग सोचकर कैसे ठीक हो सकते हैं? दुनिया में ऐसे बहुत से चमत्कार हुए हैं, लेकिन इसके पीछे के रहस्य को कोई नहीं जानता।

आज आप जो भी हैं वह आपके पिछले विचारों का परिणाम है-भगवान बुद्ध। सोचे अपनी सोच पर कि वह कितनी नकारात्म और कितनी सकारात्मक है, वह कितनी सही और कितनी गलत है। आप कितना अपने और दूसरों के बारे में अच्‍छा और बुरा सोचते रहते हैं। योग आपकी सोच को स्वस्थ बनाता है। सोच के स्वस्थ बनने से चित्त निर्मल होने लगता है। चित्त के निर्मल रहने से सेहत, खुशी और सफलता मिलती है तो विचार करें अच्छे विचार पर।

कैसे होगा यह संभव : योगश्चित्त्वृतिनिरोध:- योग चित्त की वृत्तियों का निरोध है। योग के आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार आदि सभी उपक्रम आपके चित्त को शुद्ध और बुद्ध बनाने के ही उपक्रम हैं। चित्त से ही व्यक्ति का शरीर, मन, मस्तिष्क और जीवन संचालित होता है। चित्त यदि रोग ग्रस्त है तो इसका असर सभी पर पड़ता है। रोग की उत्पत्ति बाहर की अपेक्षा भीतर से कहीं ज्यादा होती है तो समझे कि जैसे भीतर वैसा बाहर।

वैज्ञानिक कहते हैं मानव मस्तिष्क में 24 घंटे में लगभग हजारों विचार आते हैं। उनमें से ज्यादातर नकारात्मक होते हैं। नकारात्मक विचार इसलिए अधिक होते हैं कि जब हम कोई नकारात्मक घटना देखते हैं जिसमें भय, राग, द्वैष, सेक्स आदि हो तो वह घटना या विचार हमारे चित्त की इनर मेमोरी में सीधा चला जाता है जबकि कोई अच्छी बातें हमारे चित्त की आउटर मेमोरी में ही घुम फिरकर दम तोड़ देती है।

दो तरह की मेमोरी होती है-इनर और आउटर। इनर मेमोरी में वह डाटा सेव हो जाता है, जिसका आपके मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव पड़श है और फिर फिर वह डाटा कभी नहीं मिटता। रात को सोते समय इनर मेमोरी सक्रिय रहती है और सुबह-सुबह उठते वक्त भी इनर मेमोरी जागी हुई होती है। अपनी इनर मेमोरी अर्थात चित्त से व्यर्थ और नकारात्मक डाटा को हटाओ और सेहत, सफलता, खुशी और शांति की ओर एक-एक कदम बढ़ाओ।

कैसे बन जाता है व्यक्ति दुखी और रोगी : जो भी विचार निरंतर आ रहा है वह धारणा का रूप धर लेता है। अर्थात वह हमारी इनर मेमोरी में चला जाता है। आपके आसपास बुरे घटनाक्रम घटे हैं और आप उसको बार-बार याद करते हैं तो वह याद धारणा बनकर चित्त में स्थाई रूप ले लेगी। बुरे विचार या घटनाक्रम को बार-बार याद न करें।

विचार ही वस्तु बन जाते हैं। इसका सीधा-सा मतलब यह है कि हम जैसा सोचते हैं वैसे ही भविष्य का निर्माण करते हैं। यदि आपको अपनी सेहत को लेकर भय है, सफलता को लेकर संदेह है और आप विश्वास खो चुके हैं तो समझ जाएं की चित्त रोगी हो गया है। किसी व्यक्ति के जीवन में बुरे घटनाक्रम बार-बार सामने आ जाते हैं तो इसका सीधा सा कारण है वह अपने अतीत के बारे में हद से ज्यादा विचार कर रहा है। बहुत से लोग डरे रहते हैं इस बात से कि कहीं मुझे भी वह रोग न हो जाए या कहीं मेरे साथ भी ऐसा न हो जाए....आदि। सोचे सिर्फ वर्तमान को सुधारने के बारे में।

कैसे होगा यह संभव : योग के तीन अंग ईश्वर प्राणिधान, स्वाध्याय और धारणा से होगा यह संभव। जैसा ‍कि हमने उपर लिखा की इनर और आउटर मेमोरी होती है। इनर मेमोरी रात को सोते वक्त और सुबह उठते वक्त सक्रिय रही है उस वक्त वह दिनभर के घटनाक्रम, विचार आदि से महत्वपूर्ण डाडा को सेव करती है। इसीलिए सभी धर्म ने उस वक्त को ईश्वर प्रार्थना के लिऋ नियु‍क्त किया है ताकि तुम वह सोचकर सो जाए और वही सोचकर उठो जो शुभ है। इसीलिए योग में 'ईश्वर प्राणिधान' का महत्व है।

संधिकाल अर्थात जब सूर्य उदय होने वाला होता है और जब सूर्य अस्त हो जाता है तो उक्त दो वक्त को संधिकाल कहते हैं- ऐसी दिन और रात में मिलाकर कुल आठ संधिकाल होते हैं। उस वक्त हिंदू धर्म और योग में प्रार्थना या संध्यावंन का महत्व बताया गया है। फिर भी प्रात: और शाम की संधि सभी के लिए महत्वपूर्ण है जबकि हमारी इनर मेमोरी सक्रिय रहती है। ऐसे वक्त जबकि पक्षी अपने घर को लौट रहे होते हैं...संध्यावंदन करते हुए अच्छे विचारों पर सोचना चाहिए। जैसे की मैं सेहतमंद बना रहना चाहता हूं।

ND
ईश्वर प्राणिधान: सिर्फ एक ही ईश्वर है जिसे ब्रह्म या परमेश्वर कहा गया है। इसके अलावा और कोई दूसरा ईश्वर नहीं है। ईश्वर निराकार है यही अद्वैत सत्य है। ईश्वर प्राणिधान का अर्थ है, ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण। ईश्वर के प्रति पूर्ण विश्वास। न देवी, न देवता, न पीर और न ही गुरु घंटाल।

एक ही ईश्वर के प्रति अडिग रहने वाले के मन में दृढ़ता आती है। यह दृढ़ता ही उसकी जीत का कारण है। चाहे सुख हो या घोर दुःख, उसके प्रति अपनी आस्था को डिगाएँ नहीं। इससे आपके भीतर पाँचों इंद्रियों में एकजुटता आएगी और लक्ष्य को भेदने की ताकत बढ़ेगी। वे लोग जो अपनी आस्था बदलते रहते हैं, भीतर से कमजोर होते जाते हैं।

विश्वास रखें सिर्फ 'ईश्वर' में, इससे बिखरी हुई सोच को एक नई दिशा मिलेगी। और जब आपकी सोच सिर्फ एक ही दिशा में बहने लगेगी तो वह धारणा का रूप धर लेगी और फिर आप सोचे अपने बारे में सिर्फ अच्‍छा और सिर्फ अच्छा। ईश्वर आपकी मनोकामना अवश्य पूरी करेगा।

स्वाध्याय : स्वाध्याय का अर्थ है स्वयं का अध्ययन करना। अच्छे विचारों का अध्ययन करना और इस अध्ययन का अभ्यास करना। आप स्वयं के ज्ञान, कर्म और व्यवहार की समीक्षा करते हुए पढ़ें, वह सब कुछ जिससे आपके जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता हो साथ ही आपको इससे खुशी ‍भी मिलती हो। तो बेहतर किताबों को अपना मित्र बनाएँ।

जीवन को नई दिशा देने की शुरुआत आप छोटे-छोटे संकल्प से कर सकते हैं। संकल्प लें कि आज से मैं बदल दूँगा वह सब कुछ जिसे बदलने के लिए मैं न जाने कब से सोच रहा हूँ। अच्छा सोचना और महसूस करना स्वाध्याय की पहली शर्त है।

धारणा से पाएं मनचाही सेहत, खुशी और सफलता : जो विचार धीरे-धीरे जाने-अनजाने दृढ़ होने लगते हैं वह धारणा का रूप धर लेते हैं। यह भी कि श्वास-प्रश्वास के मंद व शांत होने पर, इंद्रियों के विषयों से हटने पर, मन अपने आप स्थिर होकर शरीर के अंतर्गत किसी स्थान विशेष में स्थिर हो जाता है तो ऊर्जा का बहाव भी एक ही दिशा में होता है। ऐसे चित्त की शक्ति बढ़ जाती है, फिर वह जो भी सोचता है वह घटित होने लगता है। जो लोग दृढ़ निश्चयी होते हैं, अनजाने में ही उनकी भी धारणा पुष्ट होने लगती